गुरुवार, 17 मार्च 2011

होली का हुडदंग भाग-२

होली का हुडदंग भाग-२

बोतल संग हो सोडा और कुछ नमकीन भी ,
ये शमा फिर यक़ीनन किसी जश्न सा हो जायेगा I

किसे को यूँ जबरदस्ती जाम देना है गुनाह,
देख लेना एक दिन तू ना खुदा हो जायेगा I

अद्धा भी कम पड़ रहा और तुम अभी पव्वे पे हो,
खुराक बढ़ा लो वर्ना फिर से झगडा हो जायेगा I

वैसे भी हुल्लड़ ने भी फरमाया है कुछ इस तरह,
रोज़ पव्वा पी लिया तो पीलिया हो जायेगा I

अरे जश्न होली का हो तो जाम "तन्हा" ना रहे,
हमारे चूमने भर से ही बस इसका भला हो जायेगा I

कुछ देर में रंग लेकर हम आयेंगे तेरी मुडेर पर,
तुम भी आना प्रिये जब कुछ धुंधलका हो जायेगा I

अपनी प्रीत को कुछ यूँ रंगे की ताउम्र तक याद हो
क्या पता कल का, कल वक़्त क्या से क्या हो जायेगा I

शेर बस बस यूँ अपने आप ही बनते चले ही जायेंगे
रंग की मस्ती मैं जब दिल शायराना हो जायेगा II

कमल वर्मा ०९:२५ शाम
१७/०३/२०११

बुधवार, 9 सितंबर 2009

बचपन की यादें..........

गुज़रे वक़्त के झरोखे से कुछ यादें बाहर आई थी,
अंतर्मन पे बदली बनकर कुछ ऐसी ओ छायी थी,
कुछ यादें सच्ची थी और कुछ सिर्फ छलावा थी,
कुछ थी निज अपनी और कुछ सिर्फ एक दिखावा थी,
इनमे से एक मीठी याद उसकी भी थी, ,
जिसके लिए अब तक की ज़िन्दगी जी थी
मगर आज वो हकीकत से परे सिर्फ एक याद है,
आज भी खुदा से मेरी पहली और आखिरी फरियाद है,
उनमे से एक याद एक चंचल सपने सी थी,
क्यों ना हो वो मेरे बचपने की थी,
जो पुराने आम के बगीचे बेर के पेड़ों को अब तक सहेजे थी,
बाबा की चौपाल, दादी नानी की कहानी भी समेटी थी,
वो झूठ मूठ का रोना वो टुटा हुआ खिलौना,
वो दादी की झप्पी वो बाबा का बिछौना,
वो अम्मा की फटकार वो पापा का प्यार,
गुड्डे गुडियों के खेल मे आपसी तकरार,
वो दशहरे के मेले मे जाना,
पापा के हाथों मे ऊँगली थमाना,
वो जादू के तमाशे वो जोकर के खेल,
वो चकरघिन्नी का झूला वो ठेले की भेल,
वो हनुमान जी की पूछ से झूठी लंका का जलना
वो कंधे पे बैठकर जलते रावण को तकना,
वो खिलौने वाली बन्दूक के लिए जिद करना,
फिर पूरे मोहल्ले मे उसे लेकर निकलना,
इन यादों की बदली फिर से छा गयी,
एक अरसे के बाद आज फिर रुला गयी,
क्यों की आज बहुत कुछ बदला थोडा कुछ वही है,
हम है वो है बस दादी नानी नहीं है,
दादा के बिछौने पर हम आज भी सोते है,
लेकिन दादा के लिए हम अक्सर रोते है,
वो बेर के पेड़ और बगीचे कट गए है,
हमारे खेलने के ठिकाने प्लाट मे बट गए है,
अब मेलों मे भी उतनी उमंग नहीं आती,
क्यों की अब वहां भी वो बचपन संग नहीं आती,
अब कोई गुड्डे गुडियों के खेल नहीं रचता है,
हर किसी को टी वी वीडियो गेम ही भाता है,
सच मे आज बदलाव हो रहा है,
लेकिन इस बदलाव मे कहीं बचपन खो रहा है,
डर है कहीं ये बदलाव बचपन को न ख़तम कर दे,
और आने वाली पढ़ी सीधे जवानी मे क़दम रखे
और आने वाली पढ़ी सीधे जवानी मे क़दम रखे...........

तुझसे जुदा रहकर .........

तुझसे जुदा रहकर मैं जीने को मजबूर था,
क्या करता मेरे घर से दरिया बहुत दूर था,
जाने क्या क्या कहते रहे लोग तेरे बारे मे,
और मैं था की तेरे अच्छाइयों का मशकूर था,
जब भी पूंछते थे लोग तेरे बारें मे मुझसे ,
हंसकर उनकी बात मैं टालता जरूर था,
उसकी बेवफाई का जवाब मैं देता कैसे उसे,
ज़माने मे मैं बस वफ़ा के लिए ही मशहूर था,
सुनले मुझको यूँ "तन्हा" छोड़कर जाने वाले,
मुझमे भी अब अकेले जीने का शऊर था !


kamal"तन्हा"

नव वर्ष की बेला पर ........

चल मत घिसट-घिसट ,
हँस मत सिसक-सिसक ,
उठ जहाँ से दो-दो हाँथ कर,
रह मत अलग थलग ,
साँसे जो उधार की ,
शरीर मे शुमार की ,
व्यर्थ तू गवाना मत ,
स्वयं को भुलाना मत ,
समझ जहाँ की चाल तू ,
कर कुछ कमाल तू ,
इन आम लोगो को,
दिखला की तू है प्रथक ,

...........

ये पल नव वर्ष का ,
मौका है दिल से हर्ष का ,
पतन की तू बात छोड़ ,
ये वक्त है उत्कर्ष का ,
इस वक़्त को तू जान ले ,
दिल मे आज ठान ले ,
दिखाना है इस जहाँ को ,
तुझे अपने एक नयी झलक ,
इन आम लोगो को,
दिखला की तू है प्रथक ,

रविवार, 9 अगस्त 2009

एक सच्चाई ....

हमने कुछ ऐसी ज़िंदगी देखी है,
आँसुओ मे भी ख़ुशी देखी है,
बहुत से लोगो को सोने चाँदी पे रोना आता है ,
हमने तो सिक्को मे हँसी देखी है,
ये आसमान के लोग भी हमारे ही बीच के है,
आसमान छूने से पहले इनने भी जमी देखी है,
वक़्त को भूल के ख़ुद पे यक़ीन करो,
वक़्त हाथो हमने ज़िंदगी ठगी देखी है,
अमीरो के शौक ही जलाते है ग़रीबो के चूल्हे ,
इसी यक़ीन मे चौराहे पे एक औरत खड़ी देखी है,
लोगो को ख़ुश करना भले ही पेशा हो उसका ,
रात के अंधेरे मे उसकी आँखो मे नमी देखी है ,
दौलत और शौहरत के इस खेल मे"तन्हा",
ग़रीबी के क़दमो मे अमीरी पड़ी देखी है,


कमल वर्मा "तन्हा"